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बड़े पैमाने पर शून्य-बजट खेती से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, खासकर चावल और गेहूं पर अध्ययन

बड़े पैमाने पर शून्य-बजट खेती से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, खासकर चावल और गेहूं पर अध्ययन
बड़े पैमाने पर शून्य-बजट खेती से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, खासकर चावल और गेहूं पर अध्ययन

नाबार्ड और इक्रियर का एक संयुक्त अध्ययन कहता है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती (जेडबीएनएफ) जैसी पारंपरिक कृषि पद्धतियों को बड़े पैमाने पर अपनाने को वर्तमान में बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे चावल और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 'जेडबीएनएफ: स्थिरता, लाभप्रदता और खाद्य सुरक्षा के लिए निहितार्थ' शीर्षक वाले एक अध्ययन में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर की कृषि पद्धति के रूप में जेडबीएनएफ का सुझाव देने से पहले दीर्घकालिक प्रयोग की आवश्यकता है। इसमें कहा गया है, "जेडबीएनएफ को राष्ट्रव्यापी कृषि अभ्यास के रूप में घोषित करने से पहले एक कठोर मूल्यांकन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा अनुमोदित प्रोटोकॉल आवश्यक है, क्योंकि इसके परिणाम अभी तक अस्पष्ट बने हुए हैं।"

दरअसल, ZBNF का लक्ष्य उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम करके और मिट्टी के स्वास्थ्य को फिर से जीवंत करके टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना है। अध्ययन में आईसीएआर से संबद्ध भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान के तीन साल के क्षेत्रीय प्रयोग का हवाला दिया गया है, जिसमें गेहूं के मामले में उत्पादन में 59% और बासमती चावल या ZBNF में मोटे चावल के मामले में 32% की गिरावट का अनुमान लगाया गया। अध्ययन में कहा गया है कि उत्पादकता खाद्य सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण निर्धारक है.. हालांकि आईसीएआर अध्ययन में जेडबीएनएफ को अपनाने के बाद फसल उत्पादकता की प्रतिकूल तस्वीर को दर्शाया गया है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता बढ़ गई हैं। वर्तमान में, भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति, परंपरागत कृषि विकास योजना की एक उप-योजना, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा 2020-21 से लागू की जा रही है, जो ZBNF सहित पारंपरिक स्वदेशी प्रथाओं को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
 

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